‘हम पीछे बैठकर सरकार नहीं चलाते’, केंद्र और BJP में दखलंदाजी पर मोहन भागवत का बड़ा बयान

केंद्र और भाजपा में दखलंदाजी पर मोहन भागवत ने बड़ा बयान दिया, "हम पीछे बैठकर सरकार नहीं चलाते, हम सीधे-सीधे देश की राजनीति करते।" इस बयान ने व्यापक संभावनाएं फैला दीं, जिनमें से एक यह है कि भाजपा की सरकार में खुफिया एजेंसियों को उनके कार्यक्षेत्र से बाहर करने की धारणा बढ़ गई है।

लाल किले के पास हुए आतंकी धमाके ने भागवत के बयान को और तेज बनाया, जिन्होंने कहा कि यह धमाका सामाजिक जागरूकता की कमी का परिणाम था। उन्होंने बताया कि खुफिया एजेंसियों ने आतंकी सेल का पता लगा लिया था, लेकिन सतर्क नागरिकों के समर्थन की कमी के कारण इसे रोका नहीं जा सका। यह बयान भाजपा की सरकार में खुफिया एजेंसियों के प्रभाव पर सवाल उठाता है।

भागवत ने आगे कहा, "हमें सामाजिक जागरूकता को बढ़ावा देने की आवश्यकता है, ताकि हम आतंकवाद के खिलाफ एकजुट हो सकें।" यह बयान भाजपा की सरकार में खुफिया एजेंसियों के साथ सामंजस्य बिठाने और सामाजिक जागरूकता को बढ़ावा देने पर ध्यान केंद्रित करता है।
 
नहीं तो इस तरह की बातें न किया जाए। सरकार में खुफिया एजेंसियों की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके साथ-साथ सामाजिक जागरूकता और नागरिक सक्रियता की भी जरूरत है। अगर हम सभी एकजुट हो सकते हैं और सामाजिक मुद्दों पर चर्चा कर सकते हैं, तो आतंकवाद जैसी समस्याओं को आसानी से हल कर सकते हैं।

मुझे लगता है कि सरकार को अपनी रणनीति बनाने से पहले नागरिकों की भावनाओं और चिंताओं को समझना बहुत जरूरी है। अगर हम सभी एकजुट हो सकते हैं और अपनी आवाज़ उठा सकते हैं, तो हम किसी भी समस्या का समाधान ढूंढ सकते हैं।

मोहन भागवत जी के बयान से मुझे यह संदेश आया है कि सरकार को नागरिकों के साथ सहयोग करने और उनकी जरूरतों को समझने की जरूरत है। अगर हम ऐसा कर सकते हैं, तो हम एक बेहतर देश बना सकते हैं।
 
बात तो यही है, सरकार में खुफिया एजेंसियों का प्रभाव बहुत बड़ा होता है। मैं समझता हूँ कि सामाजिक जागरूकता को बढ़ावा देने की जरूरत है, लेकिन अगर खुफिया एजेंसियाँ अपने कार्यक्षेत्र में ध्यान नहीं देती तो यह सब और भी खतरनाक हो सकता है।

मोहन भागवत जी का बयान तो सच्चाई को झेलता है, लेकिन यह सवाल उठता है कि सरकार क्या करने वाली है? हमें सामाजिक जागरूकता बढ़ावा देने की जरूरत है, लेकिन खुफिया एजेंसियों को उनके कार्यक्षेत्र में ध्यान दिलाने की भी जरूरत है।

आखिरकार, यह तो हमारी सरकार और हमारे नागरिकों पर भरोसा करने वाली बात है कि हम सामाजिक जागरूकता बढ़ावा देंगे और खुफिया एजेंसियों को उनके कार्यक्षेत्र में ध्यान दिलाएंगे।

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मोहन भागवत की बात बहुत अच्छी लगी, वाह! खुफिया एजेंसियों को उनके कार्यक्षेत्र से बाहर करने की बात तो बहुत जरूरी है, लेकिन सामाजिक जागरूकता को बढ़ावा देने की भी बहुत ज़रूरत है। 🌟 आतंकवाद के खिलाफ एकजुट होना हमारी सबसे बड़ी ताकत है, और मैं इस बात से पूरी तरह से सहमत हूँ। हमें अपने देश को सुरक्षित बनाने के लिए साथ में काम करना चाहिए, न कि खुफिया एजेंसियों पर भरोसा करके। 💪
 
मैं समझ गया है कि मोहन भागवत की बात सुनकर हमारे देश की खुफिया एजेंसियों पर सवाल उठने की जरूरत है। यह तो अच्छी बात है कि वे खुद की गलतियों को मान रहे हैं और सामाजिक जागरूकता को बढ़ावा देने की बात कर रहे हैं। लेकिन यह सवाल अभी तक नहीं उतरा है। क्या हमारी खुफिया एजेंसियों को अपने कार्यक्षेत्र से बाहर करने की जरूरत है? या फिर उन्हें और भी अधिक शक्ति देने की जरूरत है? मैं अभी तक कोई जवाब नहीं दूंगा, लेकिन मैं यह तो कह सकता हूं कि हमें अपने देश की खुफिया एजेंसियों पर और भी ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है। 🤔
 
मुझे लगता है कि भागवत जी ने अच्छा बयान दिया है, खुफिया एजेंसियों को सीधे बाहर नहीं करना चाहिए, लेकिन उनकी भूमिका तयजाही और सामाजिक जागरूकता में सुधार करना है। आतंकवादी धमाकों के बाद सामाजिक जागरूकता बढ़ाना जरूरी है, लेकिन इसके लिए हमें साथ मिलकर काम करना होगा। हमें अपने समुदाय में शिक्षित रहना चाहिए और खुफिया एजेंसियों को सहायक भूमिका निभानी चाहिए। 🙏
 
मुझे लगता है कि खुफिया एजेंसियों की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है, लेकिन सतर्क नागरिकों को भी शामिल करना चाहिए 🤝। अगर हम सामाजिक जागरूकता को बढ़ावा देते हैं, तो हम आतंकवाद के खिलाफ एकजुट हो सकते हैं और खुफिया एजेंसियों की भूमिका में विश्वास कर सकते हैं। 🤔

📚 यह लेख पढ़ें, https://www.outlookindia.com/article/मोहन-भागवत-कलबट-सापी-औ़फ-का- E0%A4%AE-%E0%A4%9F-E0%A4%BE%E0%A4%AA- E0%A4%8B%E0%A5%80%E0%A4%AE-%E0%A4%AC%E0%A4%95%E0%A4%B7%E0%A4%BC%E0%A4%91-\u200C-\u200C-\u200C-2024-%E0%A4%94%E0%A5%80- E0%A4%95-E0%A4%A3-\u200C\u200C-\u200C- E0%A4%AE-\u200C-\u200C-\u200C- E0%A4%9F\u200C- E0%A4%BE-\u200C- E0%A4%AA-\u200C-\u200C\u200C/
 
मुझे लगता है कि मोहन भागवत का बयान अच्छी तरह से विचारित था, लेकिन कुछ चीजें समझ नहीं आ रही हैं। खुफिया एजेंसियों को उनके कार्यक्षेत्र से बाहर करने की धारणा वास्तव में सही है, लेकिन सामाजिक जागरूकता को बढ़ावा देने पर हमें एक साथ मिलकर काम करना चाहिए, न कि किसी को खुद को शामिल करना।
 
अरे भाई, यह बयान मोहन भागवत ने दिया तो वास्तव में कुछ दिलचस्प बातें कह रहे हैं। पहली बात तो यह है कि उनके पीछे सीधे-सीधे देश की राजनीति करने की बात पर मुझे लगता है कि ये एक नाजुक स्थिति है। अगर हम पीछे बैठकर सरकार नहीं चलाते, तो फिर क्या हमें ऐसा करने की जरूरत है?

लेकिन, अगर मैं उनके बयान पर विचार करूं तो लगता है कि खुफिया एजेंसियों को उनके कार्यक्षेत्र से बाहर करने की बात पर ध्यान देने योग्य है। इससे हमें आतंकवाद के खिलाफ एकजुट होने में मदद मिल सकती है और सामाजिक जागरूकता बढ़ाने में भी मदद मिल सकती है।

अब, अगर हम लाल किले के आतंकी धमाके को देखें, तो मुझे लगता है कि यह बयान अच्छा था। खुफिया एजेंसियों ने आतंकी सेल का पता लगा लिया था, लेकिन सतर्क नागरिकों के समर्थन की कमी के कारण इसे रोका नहीं जा सका। यह एक बड़ी बात है और हमें इसका समाधान ढूंढने पर ध्यान देना चाहिए।
 
मुझे लगता है कि मोहन भागवत जी के बयान से यह समझने को मिल रहा है कि खुफिया एजेंसियों को और भी अधिक महत्व देना चाहिए। लेकिन, मुझे लगता है कि इन एजेंसियों पर भरोसा करना भी बहुत जरूरी है।

मैंने खुफिया एजेंसियों से जुड़े लोगों से बात की है, और वे सब कहते हैं कि उनके पास आतंकवाद के खिलाफ लड़ने के लिए बहुत सारी जानकारी है, लेकिन फिर भी धमाके हो रहे हैं। यह समझना मुश्किल है कि क्या वास्तव में उनके पास जानकारी नहीं है?

लेकिन, एक बात तो मुझे स्पष्ट है - आतंकवाद के खिलाफ लड़ने के लिए हमें सभी को एकजुट होना होगा, न कि खुफिया एजेंसियों पर ही, या सामाजिक जागरूकता पर।
 
मैंने मुंबई में अपनी छोटी बहन की शादी में एक ऐसा व्यक्ति देखा था, जो सोशल मीडिया पर आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में भाग लेने के लिए पूरी तरह से समर्पित है। वह अपने खाली समय में शिक्षा कार्यक्रम और आतंकवाद विरोधी अभियानों को बढ़ावा देता था, जिससे हम सभी ने उसकी दृढ़ता को देखा। लेकिन कभी-कभी, मैं सोचता हूं कि क्या हमारे पास वास्तव में इतने सामाजिक जागरूक नागरिक हैं?
 
मुख्यमंत्री मोदी ने भी खुफिया एजेंसियों के बारे में कहा था, "किसी भी सरकार को जिम्मेदार रहना चाहिए और देशभर में सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी।"
 
मैंने कल रात मुंबई की गार्डन्स रोड पर एक पिकनिक वाला फोटो देखा, वहां तीन बच्चे खेल रहे थे, उनके चेहरे पर इतनी खुशियाँ थी। फिर मुझे याद आया कि मेरे बचपन का स्कूल, जिसमें मैंने अपने साथी बच्चों के साथ बहुत खुशियाँ बिताई थीं।

तो आतंकी धमाके के बारे में बात करने पर, मुझे लगता है कि हमें इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए एकजुट होने की जरूरत है। लेकिन इससे पहले कि हम एक निर्णय लें, हमें यह पूछना चाहिए कि क्या हमारी शिक्षा प्रणाली में परिवर्तन की जरूरत नहीं है ताकि हम सामाजिक जागरूकता के बारे में अधिक जानते हों।
 
मुझे लगता है कि मोहन भागवत के बयान में कुछ ऐसा हुआ है, जिससे लोगों की कल्पनाएं बढ़ गई हैं । अगर हम सोचते हैं तो खुफिया एजेंसियों को उनके कार्यक्षेत्र से बाहर करने की धारणा बढ़ गई है , लेकिन मुझे लगता है कि यह एक बहुत बड़ा फैसला नहीं होना चाहिए । हमें पता चल गया है कि खुफिया एजेंसियों ने आतंकी सेल का पता लगा लिया था, लेकिन सतर्क नागरिकों के समर्थन की कमी के कारण इसे रोका नहीं जा सका । मुझे लगता है कि हमें सामाजिक जागरूकता को बढ़ावा देने की आवश्यकता है, ताकि हम आतंकवाद के खिलाफ एकजुट हो सकें।
 
नहीं, मुझे लगता है कि भागवत जी के बयान से खुफिया एजेंसियों के प्रभाव और सामाजिक जागरूकता के बीच संबंध को समझने में मदद मिलेगी। हमें आतंकवाद के खिलाफ एकजुट होने की जरूरत है, लेकिन इससे पहले भी, हमें खुफिया एजेंसियों और सामाजिक जागरूकता को समझने की जरूरत है। 🤔
 
मैं तो सोच रहा था कि मोहन भागवत यहीं फंस गए, अब तो लाल किले के पास जाने से पहले तो आतंकी धमाके करने वालों को ही नहीं, बल्कि उनकी गाड़ी ड्राइवर और सारे परिवार के सदस्यों को भी खत्म कर लेते, फिर सोच रहा था कि क्या उन्हें आतंकवाद में रुचि है या बस जाने की बात में तो मुश्किल न है, लेकिन अब यह बयान देने वाला भागवत तो मुझे हंसा रहा है।
 
मुझे लगता है कि मोहन भागवत ने आतंकी धमाकों के बाद भी अपने प्रसिद्ध बयान "चलो वापस बैठें" को नहीं बदला, जैसे कि चाट लेने के बाद खाना बनाने के लिए दोबारा शुरू करना 🤣। लेकिन अगर वास्तव में हम सामाजिक जागरूकता को बढ़ावा देना चाहते हैं तो फिर हमें अपने आपसी विश्वास पर टिप्पणी नहीं करनी चाहिए और एक-दूसरे की मदद करनी चाहिए, जैसे कि खाना बनाते समय अन्य की मदद करनी चाहिए।
 
भाजपा वाले खुफिया एजेंसियों की ताकत तो हमेशा रहेगी, लेकिन सामाजिक जागरूकता बढ़ाने की जरूरत है 🤝
 
मैंने कितनी बार सोचा है कि खुफिया एजेंसियों को हमारे देश में इतनी शक्ति दी जाती है? यह तो एक बड़ा सवाल है, क्या वे हमारे लिए फायदेमंद हैं या नुकसानदायक? जब तक हम उन्हें अपने हाथों में नहीं लेते, तब तक वे हमारी सुरक्षा के लिए खतरा बन सकते हैं।

आजकल लाल किले के पास हुए आतंकी धमाके ने यह बात तो सच कर दिखाई है। अगर खुफिया एजेंसियों ने आतंकी सेल का पता लगा लिया था, तो फिर क्यों नहीं रोका जा सका? यह एक बड़ा सवाल है, और मुझे लगता है कि हमें इसके पीछे कारणों को समझने की जरूरत है।
 
बुरा लग रहा है यह आतंकी धमाका, लेकिन मोहन भागवत का बयान अच्छा लग रहा है। उन्होंने कहा कि सामाजिक जागरूकता की कमी ही आतंकवाद को बढ़ावा देती है, यह सच है और हमें इसके बारे में बात करनी चाहिए। खुफिया एजेंसियों को उनके काम से नहीं खाली कर देना चाहिए, बल्कि हमें उन्हें सहायक बनना चाहिए ताकि वे आतंकवाद के खिलाफ लड़ सकें।
 
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