क्या RSS कार्यकर्ता के बेटे की हत्या इंटरनेशनल साजिश: पाकिस्तान से कनेक्शन, पिता बोले- न दुश्मनी-न धमकी मिली, फिर क्यों मारा

'राष्ट्रवादी दंगों' से बदले में 'निशाने पर आना'

पंजाब में 15 नवंबर को जब एक बाइक सवार ने अपने गले वाले लोगों को गोलियां बरसाईं, तभी पुलिस ने दोनों साथियों को पकड़ लिया। वहीं, इस हमले में संलग्न 3 लोगों का शव बाद में उनकी पत्नियों को छोड़कर शहर के अस्पतालों में रख दिया गया।

अगर भारत में खालिस्तानी आतंकवादी संगठन है, तो उन्होंने युवाओं और पुलिस, या फिर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं के निशाना बनने की कोशिश नहीं की है। इस मामले की जांच में कहा गया है कि नवीन की हत्या में RSS का बैकग्राउंड था।
 
ਦੁਖ਼दੈਂ ਮਿਲੇ ਉਹ ਪਿੰਡ, ਜਿੱਥੇ ਸੁਆਗਤ ਹੋਏ ਨੇ ਆਪਣੇ ਘਰ ਦੇ ਮਹਿਲ ਵਿੱਚ 3 ਯੁਵਾਂ ਉਸ ਦੀ ਕੈਦ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਜਿੰਨੇ ਖ਼ਤਰਾ ਹੋਣ, ਭਾਵੇਂ ਉਸ ਦਾ ਕੌਣ ਘੱਟ ਬਾਅਦ ਮਰ ਗਿਆ ਸੀ।
 
[एक ग्राफिक्स डालकर दिखाएं: एक पुलिसवाला अपने बंदूक से खेल रहा है, और उसे बाइक सवार ने गोली मारी है]

[एक अन्य ग्राफिक्स डालकर दिखाएं: एक राष्ट्रवादी भारतीय पत्रकार अपने कंप्यूटर पर तैनात होकर लिख रहा है, और उसे दांव लगाने वाले आतंकवादियों को पकड़ने में मदद करनी है]

[एक मजाकिया ग्राफिक्स डालकर दिखाएं: एक बाइक सवार अपने चेहरे पर घायल है, और उसके पीछे एक पुलिसवाला हाथ जोड़ रहा है]
 
ये तो खालिस्तानी आतंकवादियों की रणनीति साफ़ दिखाई देती है, पहलवान और निर्दोषों पर हमला करना उनका काम नहीं है 🤦‍♂️, लेकिन ये तो उन्हें एक अच्छा मौका भी नहीं देता। पहले तो खालिस्तानी आतंकवादी संगठनों ने अपने खिलाफ़ लड़ने वालों पर हमला किया, अब वह युवाओं और पुलिस के खिलाफ़ हैं। मुझे लगता है कि उनकी रणनीति सिर्फ इतनी आसान नहीं बनती, लेकिन फिर भी यह सोचकर चिंतित हूँ कि हमारे देश में ऐसे आतंकवादी संगठन कैसे पैदा हो गए।
 
ये तो देखिए, पुलिस कितनी तेज़ है 🕵️‍♂️। अगर नहीं था, तो ये चार कोई खालिस्तानी सवालों का बेटा न होता। लेकिन पुलिस की इस जिंदगी में एक ही खासियत है, वे सबके खिलाफ हैं। क्या उनका दिल देश की जमीन पर गिर गया?
 
मुझे लगता है कि यह देश में खालिस्तानी आतंकवाद को लेकर हमें और भी ज्यादा सावधान रहना चाहिए। लेकिन, तभी मैं सोचता हूँ कि जब हम खालिस्तानी आतंकवाद के बारे में बात करते हैं, तो किसी को भी पता नहीं है कि यहां की रेलवे ट्रैक पर मुझे डरावने अनुभव होते हैं। जैसे कि एक बार मैं थाने में गया था, वहाँ पर मिल्ली गिटार बज रहे थे, तो मुझे बस इतना खेद महसूस हुआ।
 
राष्ट्रवादी दंगों के बाद के आतंकवादी हमले वास्तव में हिंदू राष्ट्रवादी समूहों को निशाना बनाते हैं... 🚫😒 यह सुनने में कठिन लगता है, लेकिन सच्चाई यह है कि पुलिस और दंगों के बाद शांति वापस आ गई है। लेकिन कुछ मामलों में, आतंकवादी हमले हिंदू राष्ट्रवादी समूहों को निशाना बनाते हैं... यह एक खतरनाक मोड़ है जिसे हमें ध्यान में रखना चाहिए।
 
🚨 यह तो बहुत गंभीर है, जब तक हम राष्ट्रवादी दंगों के पीछे के मकसद को समझते नहीं हैं तो हमें अंधा निकलना चाहिए। 😱 नवीन की हत्या में RSS का बैकग्राउंड था, यह बहुत बड़ी बात है। लेकिन फिर भी हमें पूछना होगा कि खालिस्तानी आतंकवादी संगठनों ने युवाओं और पुलिस को निशाना बनाने की कोशिश नहीं की है, तो क्यों? 🤔 क्या हमारा देश बस इतना है कि हमें अपने पड़ोसियों के खिलाफ लड़ना ही सीखा गया है? 😡
 
ऐसे दिनों में तो खालिस्तानी आतंकवादियों से नहीं, बल्कि अपने भाई-बहन को निशाना बनाकर अपने परिवार के लिए स्ट्रीट फाइट कर लेना... 🤦‍♂️ ऐसा देखना मुझे खासकर पंजाब में नहीं आया है। और ये तो नवीन की हत्या में RSS का हाथ साबित करने की बात, लेकिन फिर भी यह सवाल उठता है कि क्या पुलिस की पारदर्शिता अच्छी नहीं है? यानी उनके द्वारा जांच में कौन-कौन से नियम तोड़े गए? 🤔
 
ये देश तो अपने नागरिकों की जान को जोखिम में डाल रहा है। पंजाब में ऐसी घटनाएं लगातार हो रही हैं और फिर भी सुरक्षा प्रणाली मजबूत नहीं है। मुझे लगता है कि सरकार को अपने नागरिकों की सुरक्षा के लिए तैयार रहना चाहिए। यह देश विस्फोटक स्थिति पर पहुंच रहा है और इसके लिए हमें एकजुट होकर कुछ करना होगा।
 
"जो लोग दूसरों को अपना ख्वाब बनाकर छूरी घुमाते हैं वे अपनी जिंदगी में ही सबसे बड़ी लड़ाई हार जाते हैं।"

मुझे लगता है कि पुलिस ने सही काम किया है, लेकिन यह सवाल उठना चाहिए कि क्या हमारी पुलिस और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसी संगठनें एक दूसरे के खिलाफ नहीं लड़ रहे हैं?
 
भारत में खालिस्तानी आतंकवाद की बात न करें, सिर्फ यह तो पता चलता है कि पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों के पास बहुत ज्यादा शक्ति है। राष्ट्रवादी दंगों में भी खालिस्तानी आतंकवादी नहीं शामिल थे, बल्कि यह तो नशीली दवाओं और अनियमितताओं के कारण हुआ।

पुलिस वाले लोग अक्सर ऐसे घटनाएं लेकर आते हैं, जिससे हमें डरा दिया जा सके। इस तरह के मामलों को खोलकर बात करना जरूरी है, लेकिन ध्यान रखें, यह तो पुलिस वाले लोग नहीं कर रहे हैं।

अगर हमारे देश में सुरक्षा और समाजिक स्थिरता की बात करें, तो हमें अपनी सरकार और पुलिस पर भरोसा करना चाहिए। उन्हें खुश रखना जरूरी नहीं है, बल्कि उनकी हरकतों और निर्णयों पर विचार करना चाहिए।
 
राजनीतिक गड़बड़ी को देखते हुए ये तो देख लिया, पर मेरे सोच में कुछ सवाल भी हैं। अगर खालिस्तानी आतंकवादी संगठनों ने इतनी आसानी से पुलिस और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कार्यकर्ताओं का निशाना बनाने का मौका नहीं मिला, तो इसका मतलब ये है कि हमारे देश में आतंकवादी संगठन बहुत कमजोर हैं और हमारे पास उन्हें पकड़ने का एक अच्छा सिस्टम है। लेकिन, अगर RSS का बैकग्राउंड था, तो यह सवाल उठता है कि क्या राजनीतिक दल भी अपने विरोधियों के खिलाफ आतंकवादी हमले करवाने में मदद करते हैं?
 
यह दिल को टूटने वाला है... एक युवक की जान जानबूझकर लेनी तो बहुत ही गंभीर अपराध है, और पुलिस के साथ भी ऐसी चीजें करने का रास्ता नहीं होना चाहिए। लेकिन यहां तक कि आतंकवादी गतिविधियों में भी, खालिस्तानी संगठनों ने युवाओं और पुलिस को निशाने पर लेने की जगह, शांतिपूर्ण तरीकों से समस्या का समाधान करने पर ध्यान दिया जाना चाहिए। हमें यह सोचना होगा कि युवाओं को रास्ता दिखाया जाए, उन्हें शिक्षित किया जाए और उनकी जरूरतों को समझने की कोशिश की जाए ताकि वे गलत तरीकों में न चलें।
 
बिल्कुल सही है की पुलिस ने युवाओं और पुलिस, या फिर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं के निशाना बनने की कोशिश नहीं की है। यह एक बहुत बड़ा मुद्दा है जिस पर हमें ध्यान देना चाहिए। नवीन की हत्या में RSS का बैकग्राउंड था, लेकिन इससे भी स्पष्ट नहीं होता कि खालिस्तानी आतंकवादी संगठन ने इस हमले में शामिल थे या नहीं।
 
ये तो बहुत ही दुखद घटना है... खालिस्तानी आतंकवादियों ने युवाओं को इतना निशाना बनाया है, जैसे वो सिर्फ हमारे देश में ही नहीं बल्कि पूरे भारत में खतरा फैला रहे हैं... लेकिन यह सवाल उठता है कि अगर RSS का बैकग्राउंड था, तो क्या इसका मतलब यह है कि वो खुद आतंकवादी नहीं हैं? ये एक बहुत बड़ा सवाल है जिसका जवाब देने में समय लगेगा... लेकिन यह बात जरूर है कि हमें अपने देश में आतंकवाद के खिलाफ लड़ने के लिए संगठित होने की जरूरत है 🤔
 
🚨 यह तो बहुत बड़ी गड़बड़ है... पुलिस को साफ तौर पर पता चल गया है कि नवीन की हत्या में RSS का हाथ था, लेकिन फिर भी उन्होंने RSS के नाम पर कुछ नहीं किया। यह तो आतंकवादी संगठन होने के बजाय दंगाइयों को उजागर कर रहा है... और पुलिस को अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करनी चाहिए।
 
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