पश्चिम बंगाल में बांग्लादेशी घुसपैठियों-SIR पर टिप्पणी करके फंसी बीजेपी: शरणार्थी मतुआ समुदाय में नाराजगी; बीजेपी का पार्टी नेता के बयान से किनारा

पश्चिम बंगाल में बांग्लादेशी घुसपैठियों पर दिए गए बयान से शरणार्थी मतुआ समुदाय को निराशा हुई है। लाल सिंह आर्य ने कहा था कि जिन लोगों के नाम हटाए गए हैं, उनका नाम वापस जोड़ा जाएगा। इसके बाद हुए बयान और इस प्रक्रिया पर केंद्रीय मंत्री शांतनु ठाकुर के समर्थकों ने मतुआ समुदाय से मारपीट के आरोप लगाए हैं।

मतुआ समुदाय का यह दावा है कि बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने इस मामले में उनकी ओर से बात नहीं की। इसके अलावा, मतुआ समुदाय ने कहा है कि SIR में जिन लोगों के नाम हटाए गए हैं, उन्हें वापस जोड़ा जाएगा।

इस पर शांतनु ठाकुर ने बात नहीं की, जबकि उनके समर्थकों ने कहा है कि यह आरोप गलत था। मतुआ समुदाय ने इस मामले में एक सड़क जाम का ऐलान किया है।

मतुआ समुदाय बांग्लादेश से आए दलित हिंदू शरणार्थियों का बड़ा समूह है, जो चुनाव के दौरान प.बंगाल के उत्तर 24 परगना, नदिया और दक्षिण 24 परगना जिलों में निर्णायक भूमिका निभाता है।
 
क्या बोले सरकार के द्वारा कुछ लोगों को स्थान नहीं दिया गया? यह तो एक बड़ा मुद्दा है और ऐसे बयान करने वाले लोगों पर शर्म की जरूरत है। लेकिन ऐसा होते हुए भी, जो लोग बोलते हैं उन्हें सुनने की जरूरत नहीं है, उनके मानने की जरूरत नहीं है... 😐

और यह तो एक और सवाल है कि अगर ऐसे बयान करने वाले लोग अपने बयान से श्रापित निकलें, तो उन्हें क्या दिया जाएगा? उनके समर्थकों को कुछ न कुछ जरूर मिलेगा, और शायद यही सब तय हुआ है। क्या बोले सरकार, लोगों की आवाज़ पर ध्यान नहीं देते, बस अपने चुनावी गठबंधन को सुरक्षित करते रहते हैं... 🤔
 
मुझे लगा कि यह बात बहुत ही अस्वस्थ है... पूरी तरह से स्पष्ट नहीं है कि लाल सिंह आर्य ने क्या कहा था और कैसे बयान बदल गया। इसके बाद इतनी भीड़भाड़ में तो दुर्भाग्यपूर्ण है... किसी एक व्यक्ति के बयान से पूरा समुदाय पर दमनकारी दबाव आ रहा है।

मतुआ समुदाय ने बात क्या कही है, यह जानने की जरूरत है कि कैसे उनके मामले में बयान बदल गया। और शांतनु ठाकुर, प.बंगाल चुनाव में क्यों नहीं आ रहे हैं।

तो दूर से नज़र आया, लगता है एक बड़ा मेल हुआ है। ऐसी बातचीत करने वाले लोग तो मुझे कभी पसंद नहीं आते।
 
मारपीट हुई तो शांतनु ठाकुर देखिए, मारपीट नहीं हुई तो उन्हे तो बताए की सीर में कौन जोड़ा गया?

मतुआ समुदाय बात कर रहा है तो अच्छा, लेकिन प.बंगाल में चुनाव होता है, वहाँ मतुआ समुदाय बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। सिर्फ एक सड़क जाम करने से सब कुछ हल हो जाएगा? नहीं तो उनकी बात सुननी चाहिए।

मुझे लगता है कि अगर मतुआ समुदाय की बात मानी जाए तो सब कुछ ठीक हो सकता था। लेकिन जब सिर्फ एक तरफ दखल देने पर तो क्या हल निकलेगा?

यह जानना जरूरी है कि मतुआ समुदाय का यह दावा कितना सच्चा है? और अगर सच है तो शांतनु ठाकुर को उनकी बात सुननी चाहिए।
 
"देवी तुष्टि करेगी, संताप पीड़ा न करेगी"

मैं समझता हूँ कि मतुआ समुदाय को यह बात पसंद नहीं आयी कि उनके दोस्तों के नाम हटाए गए और फिर वापस जोड़े गए। लेकिन मुझे लगता है कि हर समस्या का एक समाधान होता है, हमें सोच-विचार करना चाहिए कि कैसे इस पर दोस्ती और समझदारी से निपटना चाहिए।
 
🤔👥😕

चुनाव के दौरान मतुआ समुदाय वोट डालते हैं, लेकिन फिर वोट देने की जिम्मेदारी अपने परिवार को नहीं देते 🤝

🚫🏃‍♂️ SIR में नाम हटाना एक बड़ा मुद्दा है, लेकिन समर्थकों ने बात नहीं की तो फिर ये सब क्यों? 🙄

ज़रूरी सुनवाई होनी चाहिए, और पीड़ितों को justice देना चाहिए 💼👮
 
ਸੋ, ਇਹ ਘटना तो बहुत ਜ਼्यादਾ ਦੁਖਦਾਈ ਗਈ ਹੈ। ਮੈਨੂੰ ਲੱਗਦਾ ਹੈ ਕਿ ਸਭ ਤੋਂ ਪਹਿਲਾਂ ਬੀਜੇਪੀ ਵਾਲੀ ਅਗਵਾਈ ਨੂੰ ਖੁਦ ਆਪ ਕੁਝ ਨਹੀਂ ਕਿਹਾ ਸੀ। ਇਸ ਮੁਹਿੰਮ ਵਿੱਚ ਬਗੈਰ ਲੋਕਾਂ ਦੇ ਖੜ੍ਹੇ ਨਹੀਂ ਹੋਣ ਦਾ ਸੁਭਾਉ। ਅਤੇ ਬੀਜੇਪੀ ਵਾਲੇ ਕੌਮੀ ਰाष्ट्रीय सुरक्षा (SIR) ਮੈਂਬਰ ਦੇ ਨਾਂ 'ਤੇ ਹੋਏ ਕੰਡੀਪੇਸ਼ਨ ਵਿੱਚ ਲੋਕਾਂ ਦੇ ਖੜ੍ਹੇ ਨਹੀਂ ਹੋਣ ਬਾਰੇ ਭਾਰਤੀ ਮੀਡੀਆ ਵਿੱਚ ਕਦੇ ਗੱਲ ਨਹੀਂ ਕੀਤੀ।
 
अरे वाह, यह तो बहुत बड़ा मुद्दा है! मैंने देखा था कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पूरी संभावनाओं पर खरीद ली थी। अब तो बीजेपी के मुस्कुराहट से नहीं टूटेगी। लेकिन मतुआ समुदाय की बात है तो यही कह रहा है कि उनकी आवाज़ सुनने को मिले। शांतनु ठाकुर जी ने बात नहीं की, लेकिन उनके समर्थकों ने तो बोल दिया। अरे यार, यह सब तो एक बड़ा खेल है। मुझे लगता है कि पूरे मामले में झूठे आरोप लगाए गए।
 
बहुत बड़ा मुद्दा है यह! मतुआ समुदाय के साथ देखे गए दुर्व्यवहार से पूरे बंगाल में जान भर गई है 🚨। क्या लाल सिंह आर्य ने बीजेपी के मुखियों को अपने बयान पर खत्म करने के लिए कहा था? इसके बजाय, बातचीत कुछ भी नहीं हुई। सिर्फ शांतनु ठाकुर के समर्थक ही इस मामले की जिम्मेदारी ले रहे हैं 🤔। और अब मतुआ समुदाय ने एक बड़ा सड़क जाम कर दिया है! यह तो विपक्षी दलों के लिए बहुत अच्छा अवसर होगा। शायद कुछ सच्चाई उजागर होती है।
 
अरे बेटा, यह सब बहुत ही गंभीर दृश्य है 🤕। मतुआ समुदाय को ऐसा महसूस होना चाहिए कि उनका सम्मान नहीं माना जा रहा है। लाल सिंह आर्य ने एक अच्छा बयान कहा, लेकिन इसके बाद हुए बयान और प्रक्रिया से यही लगता है कि समाज में भेदभाव ही बना हुआ है 🤦‍♂️

कुछ लोग कहते हैं कि मतुआ समुदाय ने अपना दावा गलत लगाया, लेकिन इतनी जल्दी कहना नहीं चाहिए। यह मामला बहुत जटिल है, और हमें सुनिश्चित करना चाहिए कि हर व्यक्ति, चाहे उनकी जाति या आर्थिक स्थिति कुछ भी, उनके अधिकारों का सम्मान करें।

यह एक अच्छा अवसर है कि हमें एक दूसरे को समझने और सम्मान करने की जरूरत है। मतुआ समुदाय के लोग संघर्ष करते आ रहे हैं और उनकी आवाज़ महत्वपूर्ण है।
 
ਮेरੇ ਦਿਲ ਵਿੱਚ ਸ਼ਰਧਾ ਹੈ, ਜੇ ਕੋਈ ਗੱਲ ਖੁੱਟੀ ਨਹੀਂ ਤਾਂ ਮੈਨੂੰ ਉਸ 'ਤੇ' ਪਤਾ ਕਿਵੇਂ ਗਏ। ਬਾਲ सिंह आर्य कੀ ਗੱਲ ਦੇ ਦੋਹਾਂ ਪਾਸੇ ਖ਼ਰਾਬ-ख਼ਰਾਬ ਤਾਕਤ ਦਿੱਤੀ। ਪਰ ਮੈਨੂੰ ਲੱਗਣ ਵਾਲਾ ਹੈ ਕਿ ਖੁੱਟੀ ਗਈ ਇਸ ਗੱਲ ਦੀ ਬੜੀ ਮੁਸ਼्किल ਤਰ੍ਹਾਂ ਹੋਵੇਗੀ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਗੋਲ-ਭरੇ ਦੱਸ-दੱਸ ਅਤੇ ਘੱਟ-ਕਰੀਬੀ ਪ੍ਰਤੀ ਉਨ੍ਹਾਂ ਲੋਕਾਂ ਦੀ ਛਾਵਣੀ ਦਿੱਤੀ।

'મુજ તારી સાથે આપણે, ઉન્ને અમરે કહેવાય છે...''

(ਸ਼ਿਖ਼ਰ)
 
😕 यह बात बहुत बड़ी है कि कुछ लोग बांग्लादेश से आए दलित हिंदू शरणार्थियों को खेद नहीं करते हैं। मुझे लगता है कि उनकी समस्याओं को समझने की जरूरत है। हमें उनकी समस्याओं को समझने की जरूरत है और उनके साथ सहानुभूति रखनी चाहिए। लेकिन यह देखकर परेशान हुआ कि कुछ लोगों ने उनके खिलाफ मारपीट के आरोप लगाए हैं। 🤔
 
मैंने पढ़ा कि सिर्फ बीजेपी के समर्थक ही मतुआ समुदाय को सहानुभूति नहीं दे रहे हैं? मैंने सोचा था कि हमें विपक्षी पार्टियों की भी गलतियाँ पहचाननी चाहिए, लेकिन फिर मैंने देखा कि कुछ लोग मतुआ समुदाय को बिल्कुल सहानुभूति नहीं दे रहे हैं, यह तो मेरे द्वारा सोचे गए विपक्षी पार्टियों के पक्ष में बयान था, लेकिन फिर भी मैंने ऐसा ही सोचा।
 
मेरे विचार में यह बहुत गंभीर मामला है जिस पर कोई ध्यान नहीं दे रहा है। मतुआ समुदाय को ऐसा महसूस करना चुनौतीपूर्ण होगा जब उनकी पहचान और सुरक्षा को लेकर कुछ लोग विवादित बयान कर रहे हैं। मुझे लगता है कि हमें यह समझना चाहिए कि मतुआ समुदाय की समस्याएं गहरी और जटिल हैं और हमें उनकी बात सुननी चाहिए। यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि उन्हें अपने अधिकारों के लिए लड़ने में मदद की जाए। शांतनु ठाकुर ने इस मामले में बात नहीं की, लेकिन उनके समर्थकों ने कहा है कि यह आरोप गलत था। 🤔
 
मुझे लगता है कि यह बहुत बड़ा मुद्दा है, लोगों को यह नहीं पता कि उनकी बोलियां और परंपराएं किसने देखी हैं? शांतनु ठाकुर ने क्या कहा था या नहीं कहा था, इसके बारे में लोगों को यह जानने से पहले उन्हें यह पता लगाने की जरूरत है कि उनका बयान क्या था। और मतुआ समुदाय के लोगों को यह नहीं पता है कि उनके नाम क्यों हटाए गए और फिर से जोड़े गए? यह बहुत परेशान करने वाली बात है। मुझे लगता है कि इस मामले में अधिकारी को गंभीरता से लेने की जरूरत है। 😕
 
मेरी राय तो यह है कि बीजेपी नेताओं से ऐसी बातें निकलने से शरणार्थियों की उम्मीदें टूट जाती हैं और उन्हें डरने का मौका मिलता है। मतुआ समुदाय बहुत भारी परिस्थितियों से गुजर रहा है और ऐसे बयान से उनकी स्थिति और खराब हो गई होगी।
 
बस यह तो बहुत गाली देने वाला है कि लोग एक-दूसरे को घुसपैठिया कहते हैं और फिर उन्हें अपनी भाई-बहन मानकर नहीं छोड़ पाते। मुझे लगता है कि यह बहुत सारी समस्याओं का समाधान नहीं है। शांतनु ठाकुर ने बात नहीं की, लेकिन उनके समर्थकों ने आरोप लगाए हैं और अब मतुआ समुदाय ने एक सड़क जाम का ऐलान कर दिया है। तो यह तो बहुत ही गंभीर स्थिति बन गई है... 😕
 
बोलते समय बोलना सीखते समय गलती नहीं होती, लेकिन इस तरह की बातों से मतुआ समुदाय को बहुत परेशानियों में डाल दिया जा रहा है 🤕। उन्हें अपने अधिकारों की जानकारी होनी चाहिए, लेकिन अगर किसी तरह की गलतफहमी हो रही है तो सरकार और राजनेताओं से खुलकर बात करनी चाहिए। मतुआ समुदाय का दावा कि उनके नाम वापस जोड़े गए हैं , शायद सच हो सकता है, लेकिन इस तरह की बातों से पहले खुद को समझना और अपने अधिकारों को जानना चाहिए।
 
पश्चिम बंगाल की चुनाव परिस्थितियां तो बहुत ही अजीब सी हैं... 😒 पूरे देश में मतुआ समुदाय के लोगों को जानबूझकर नुकसान पहुंच रहा है। सबसे पहले, Lala Singh Ary ji ke बयान से उनका समाज निराश हो गया था। फिर केंद्रीय मंत्री शांतनु ठाकुर के समर्थकों ने उन्हें मारपीट करने का आरोप लगाया... यह तो बहुत दुखद है! 🤕 और सिर्फ इसलिए नहीं जा रहे हैं कि उनकी ओर से बात नहीं की। प.बंगाल में चुनाव की घड़ी में इतनी गहरी धारा आ गई है, लेकिन हमें यह भी याद रखना चाहिए कि मतुआ समुदाय ने अपना खास अधिकार है... उनकी आवाज़ को सुनना चाहिए। 🙏
 
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