अरे भाई, यह तो बहुत बड़ा मुद्दा है... राहुल-प्रियंका जी के पास संगठन बदलने का तरीका तो तय करना होगा, फिर देखेंगे कि देश कैसे चलेगा। मुझे लगता है कि उन्हें अपने राजनीतिक संघर्षों में थोड़ा अधिक संवाद करना चाहिए, बोलकर तो नहीं सुनना... और फिर भी देखें, शायद बदलाव उनके पक्ष में चलेगा।
मैं याद करता हूँ जब पार्टियों के बीच मतभेद थे, तब वे तो लोकतंत्र की सबसे बड़ी चुनौती समझते थे। अब यह तो एक आम बात हुई है, हर कोई अपना अलग रास्ता ढूंढ रहा है। मुझे लगता है कि इसे स्वीकार कर लेना और आगे बढ़ना चाहिए।
मैं याद करता हूँ जब पार्टियों के बीच मतभेद थे, तब वे तो लोकतंत्र की सबसे बड़ी चुनौती समझते थे। अब यह तो एक आम बात हुई है, हर कोई अपना अलग रास्ता ढूंढ रहा है। मुझे लगता है कि इसे स्वीकार कर लेना और आगे बढ़ना चाहिए।