मुझे लगता है कि दीपक रावत जी ने अपने वाक्यांश में एक बहुत बड़ा सवाल उठाया है। हमारी समाज को समझने के लिए, हमें यह पहचानने की जरूरत है कि हर किसी की अपनी कहानी, अपने अपने संघर्ष और अपने अपने लक्ष्य होते हैं। उन्होंने अपने चाचा और भाई जैसे एक रिश्तेदार को लेकर बात की है, यह तो समझ में आता है, लेकिन देशवासियों पर ताना बनाकर, हमारी समाज की जटिलताओं को समझने की जरूरत नहीं होती।