संडे जज्बात-टीबी से मेरा पूरा परिवार खत्म हुआ: आखिरी सहारा भाई भी मरा, सगे-संबंधी मुझे छूने से डरने लगे- एक अजनबी ने गोद लेकर जिंदगी दी

दीपक रावत: मेरे चाचा और भाई जैसे एक रिश्तेदार को लेकर मैं अपने सामाजिक ख्यालों पर ही नहीं, बल्कि देशवासियों पर ताना बनाया
 
राजनीतिज्ञों की दुनिया में दीपक रावत ने फिर एक बार मामला उजागर कर दिया है। उनके चाचा और भाई जैसे परिवार संबंधों को लेकर उन्होंने अपने विचार व्यक्त किए हैं। यह तो एक आम बात है कि राजनेताओं की अपनी-अपनी समस्याएं होती रहती हैं, लेकिन दीपक रावत जी ने ऐसा नहीं किया, बल्कि उन्होंने सामाजिक मुद्दों को लेकर भी विवाद में पड़ गए।

राजनीतिज्ञों को अक्सर अपने परिवार संबंधों को राजनीति में बहाना बनाकर लोकप्रियता हासिल करने की कोशिश करते हैं। इससे देशवासियों को विश्वास की कमी होती है।
 
मुझे लगता है कि दीपक रावत जी ने अपने चाचा और भाई को लेकर बहुत ज्यादा आलोचना की है, लेकिन मैं सोचता हूँ कि शायद उनके पास कुछ गहरे दर्द की बातें थीं जिनके बारे में वे बोल रहे थे। मुझे लगता है कि हमें अपने परिवार के लिए स्वीकृति और समझदारी की जरूरत है, न कि आलोचना और ताना. मैं उनकी भावनाओं को समझने की कोशिश करता हूँ, लेकिन मुझे लगता है कि उन्हें अपने शब्दों में व्यक्त करने का मौका देना चाहिए था, न कि आलोचना करना. 😊
 
मुझे यह बात पसंद नहीं 😐। दीपक रावत जी को उनके बयान से दुःख हुआ, लेकिन मुझे लगता है कि उनका बयान थोड़ा गलत तरीके से व्यक्त हुआ। उनके चाचा और भाई को लेकर बोले जाने की वजह से उन्हें देशवासियों पर ताना बनाया जाना असहज है। लेकिन मुझे लगता है कि यह जरूरी नहीं कि उनका बयान सही था। हमें अपने विचारों को व्यक्त करने की स्वतंत्रता दी जाती है, लेकिन उन्हें सही तरीके से व्यक्त करना भी जरूरी है।
 
अरे, ये तो बहुत गंभीर मुद्दा है 🤕, रिश्तेदारों के बीच देखभाल और समझ की जरूरत है #सामाजिकख्याल #परिवारसमाज

मेरा खयाल है कि जैसे ही हम अपने परिवार को समझते हैं और उनकी जरूरतों को पूरा करते हैं, वैसे ही हम एक दूसरे के साथ अच्छे संबंध बनाते हैं #परिवारसमाज #संबंध

लेकिन जब कोई ऐसी बात करता है जो लोगों को परेशान कर रही है, तो यह हमारे समाज में नकारात्मकता फैलाती है 🤔 और सामाजिक ख्यालों को भी प्रभावित करती है #नकारात्मकता #सामाजिकख्याल
 
अरे, यह तो बहुत ही व्यस्त हो गया है... दीपक रावत ने किसी भी तरह से अपने चाचा और भाई को एक रिश्तेदार के रूप में लिया है और फिर देशवासियों पर ताना बनाया है। तो अब यह सवाल है कि क्या वाहिनी पर दिखाए गए उस वीडियो की सच्चाई कैसे साबित होगी?

मेरा मानना है कि ऐसी चीजें होने की ज्यादा जरूरत नहीं है। अगर कोई रिश्तेदार में कुछ गलत है, तो उस पर अपने सामाजिक ख्यालों के बावजूद उससे बात करें और समझने की कोशिश करें। देशवासियों पर ताना बनाकर कौन फायदा होगा? यह तो बस एक वीडियो बनाने वाले के पैसे का तरीका है।

आजकल यहां पर हर चीज़ से जुड़ी जाती है और हर वीडियो एक हिट बन सकता है। लेकिन इसके लिए हमें अपने मन में कुछ स्थिरता रखनी चाहिए।
 
मुझे यह देखकर बहुत चिंता होती है कि हमारे समाज में इतने लोग बातचीत में दूसरों को आह्तित करने की बात करते हैं। दीपक रावत जी ने अपने अनुभव साझा किया है कि उनके एक परिवार के सदस्य ने दूसरे व्यक्ति के साथ जैसे संबंध बनाए, वोी उसी तरह बातचीत कर सकते थे, लेकिन फिर भी उन्होंने दूसरे व्यक्ति को आहत किया है। यह हमें विचार करने पर मजबूर करता है कि हम अपने शब्दों और क्रियाओं से कैसे प्रभाव डालते हैं।
 
अरे देखो, ये सचमुच बहुत ही दिलचस्प बात है दीपक रावत जी की, चाचा और भाई को लेकर उन्होंने अपने विचार व्यक्त किए हैं। मुझे लगता है कि यह एक बहुत ही जरूरी बात है कि हमारे समाज में परिवार की प्रतिष्ठा और रिश्तों को लेकर खुलकर बात करना चाहिए। जब हम अपने परिवार के सदस्यों से खुश नहीं रहते तो यह हमारे देशवासियों के लिए एक बड़ा मुद्दा हो सकता है।
 
मुझे यह बात बहुत पसंद है दीपक रावत जी की वो एक्टिविस्ट बनने का, मेरा भाई उनसे बहुत प्यार करता है और मैं उनकी हर विडियो देखता रहता हूँ, ये हमारा देश कितना छोटा सा है, लेकिन इतने बड़े विचारों से भरा हुआ है 🤯। मुझे लगता है कि उनकी आवाज़ तो हमें जरूर सुननी चाहिए, मैं उनकी हर बात पर जोर देता हूँ, खासकर जब वो अपने रिश्तेदारों के लिए कहते हैं, और उसके बाद मेरा मन ही मन चल जाता है, मैं उनकी तरह से निकलने की कोशिश करता रहता हूँ 💖,
 
मुझे लगता है कि दीपक रावत जी ने अपने वाक्यांश में एक बहुत बड़ा सवाल उठाया है। हमारी समाज को समझने के लिए, हमें यह पहचानने की जरूरत है कि हर किसी की अपनी कहानी, अपने अपने संघर्ष और अपने अपने लक्ष्य होते हैं। उन्होंने अपने चाचा और भाई जैसे एक रिश्तेदार को लेकर बात की है, यह तो समझ में आता है, लेकिन देशवासियों पर ताना बनाकर, हमारी समाज की जटिलताओं को समझने की जरूरत नहीं होती।
 
मुझे लगता है कि इस मुद्दे पर बहुत से लोगों को लगन होगा 😕। जैसे हमारे देश में बेरोजगारी दर बढ़ रही है, तो ऐसे प्रतिभाशाली व्यक्तियों को नौकरी नहीं मिलनी चाहिए।

बेरोजगारी दर 2022 में लगभग 7.4% थी, लेकिन वर्ष 2025 तक इसे 8.1% कर दिया गया। यह आंकड़ा हमें यह बताता है कि कई युवाओं को नौकरी नहीं मिल पाई है।

आजकल नौकरी मिलने के लिए स्कूल और कॉलेज में 10वीं और 12वीं की परीक्षाएं बहुत मुश्किल हो गई हैं। इसीलिए हमें युवाओं को रोजगार के अवसरों की तलाश में मदद करनी चाहिए। 📈
 
नहीं तो कोई बात, मुझे यह तो बहुत पेचीदा लग रहा है... दीपक रावत जी ने अपने चाचा और भाई के इशारे पर एक्सप्रेशन फेस बनाकर सोशल मीडिया पर प्रदर्शन किया, लेकिन मुझे लगता है कि यह सिर्फ एक खेल है। क्या वास्तव में हमारी समाज में ऐसे रिश्तेदार हैं जो हमें देशवासियों की नज़रिए से देखने के लिए मजबूर करते हैं?

मुझे लगता है कि यह एक अच्छा मौका है कि हम अपने परिवारिक रिश्तों को भावनात्मक बनाएं और देशवासियों की समस्याओं को सुलझाने के लिए एकजुट हों, न कि व्यक्तिगत मुद्दों पर चर्चा करें। 🤔
 
🙏 दीपक रावत की बातें सुनकर मुझे लगता है कि वो लोग जिन्हें अपने चाचा, भाई, दादा-दादी, बहन-भाई को एक ही परिवार में रखना पसंद नहीं है, उनकी बात समझी जानी चाहिए। आजकल के समय में हर किसी को अपने परिवार और संबंधों को अपने तरीके से चलाने की ज्यादा छूट मिलती है। लेकिन फिर भी, हमें समझना चाहिए कि हर किसी की जरूरतें अलग-अलग होती हैं और उनको एक-दूसरे के प्रति सहानुभूति रखनी चाहिए। जैसे मेरे चाचा, जो हमेशा से शिक्षक रहे हैं, उनकी बात समझनी चाहिए, लेकिन उनकी जरूरतों को भी मानना चाहिए कि वो एक अलग तरीके से अपने परिवार को चलाना चाहते हैं।
 
मुझे लगता है कि यह सब बहुत ही फुसलने वाला हो सकता है, लेकिन मेरा विचार यह है कि हमें अपने रिश्तेदारों को बहुत सावधानी से देखना चाहिए, और नहीं तो वो हमारे जीवन को पूरी तरह से बदल सकते हैं। मैंने भी अपने खाली समय में कुछ ऐसा खेला है जहां मुझे अपने दोस्तों को रिश्तेदार बनाना पड़ता है, और मुझे पता चलता है कि यह बहुत ही मुश्किल है।
 
मुझे लगता है कि दीपक रावत जी को समझने की जरूरत है। वो चाचा और भाई की बात कर रहे हैं और फिर सामाजिक ख्यालों पर आगे बढ़ रहे हैं। लेकिन मुझे लगता है कि उनकी बात में एक और तर्क हो सकता है। अगर हम देश की समस्याओं को हल करने की बात करें, तो शायद चाचा और भाई की बात सही से नहीं हुई होगी।
 
मुझे यह बात बहुत पसंद नहीं कि कोई व्यक्ति अपने रिश्तेदारों को लेकर इतना तीर और ताना बना रहे हैं 🤦‍♂️। दीपक रावत जी ने अपने चाचा और भाई को लेकर बहुत खुलकर बात की है, लेकिन मुझे लगता है कि इससे कुछ फायदा नहीं होगा। शायद वे अपने परिवार के सदस्यों की गालियां करने से पहले थोड़ी सोच-समझकर बात कर लें और देशवासियों को यह नहीं दिखाएं कि हमारे पास बोलबाला है 🙅‍♂️
 
😐 इस तानाशाही व्यवहार को समझने की जरूरत नहीं है, बस उसकी त्रुटियों और बुराइयों को देखना है जैसे मेरे चाचा जी की तरह एक रिश्तेदार पर बहुत ज्यादा निर्भर रहना। लेकिन फिर भी, मैं उनकी भलाई के लिए हमेशा तैयार रहता हूँ। 🤗

जैसे वहां तो कुछ ऐसा हुआ है जिसे समझने की जरूरत नहीं है, बस सुनने की जरूरत है। 😐 मेरी बात और सबकी बातों को ध्यान में रखें, फिर देखिए कि क्या सही पता चलता। 👍
 
😒 मुझे यह बातें अच्छी नहीं लगती... कोई भी ऐसा दावा करने से पहले पुरी जानकारी इकट्ठा कर लेना चाहिए। दीपक रावत जी ने अपने चाचा और भाई को मीडिया के लिए इस्तेमाल कर दिया है, लेकिन इससे पहले कि हम उनके बारे में कुछ कहें, पता चलना चाहिए कि वे कौन हैं, उनकी जिंदगी कैसी रही, और क्या वे सही स्थिति में हैं। मैं इसके लिए कोई सबूत नहीं देख पाया, बस एक भ्रामक बयान दिया गया।
 
ये तो बहुत ही अजीब बात है दीपक रावत जी, आप किसी भाई-चाचा को लेकर सामाजिक ख्यालों पर ताना बनाने का मुह में आ गए हैं? शायद आपको अपने ख्यालों पर फोकस करने की जरूरत है न?
 
चलो देखें, यही बात कहीं भारत में चली जाती है, रिश्तेदार के दीवाने लोग हो जाते हैं और फिर वे अपने सामाजिक ख्यालों पर ही नहीं, बल्कि हमारे समाज पर ताना बनाते हैं। दीपक रावत जी ने अपने चाचा और भाई के बारे में बात की है, लेकिन उनकी बात को सुनने के पहले, हमें यह सवाल करना है कि वे क्यों ऐसे हुए? क्या उन्हें पता था कि उनके रिश्तेदार की बातें हमारे समाज पर गिर सकती हैं?

मुझे लगता है कि इस तरह की बातें करने वाले लोगों को हमें सोचने पर मजबूर करना चाहिए। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि रिश्तेदार हमारे जीवन में बहुत महत्वपूर्ण होते हैं, लेकिन उनकी बातों को हम अपने सामाजिक ख्यालों पर नहीं छोड़ सकते।

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